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कुंडली में विवाह योग

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कुंडली में विवाह योग

कुंडली में विवाह योग, किसी भी युवा व्यक्ति के जीवन के लिए सभी संस्कारों में विवाह श्रेष्ठ व आवश्यक है। इसकी सफलता-असफलता अगर दंपति के बीच आपसी विश्वास और वचनबद्धता पर निर्भर है, तो इस संदर्भ में विवाह पूर्व की जाने वाली जन्म-कुंडलियों की ज्योतिषीय गणना भी काफी महत्वपूर्ण साबित होती हंै। यह युवक-युवती के विवाह योग को बारीकी से विश्लेषित करता है। इसके द्वारा व्यक्ति के सुखद, सुसंस्कृत व सफल वैवाहिक जीवन की संभावनाओं का आकलन किया जाता है, तो यह बेहतर भविष्य निर्माण को मजबूत आधार भी देता है।

कुंडली में विवाह योग
कुंडली में विवाह योग

आज के डिजिटल दौर में तकनीक की लहरों पर सवार युवा वैज्ञानिकता, आधुनिकता और खुद को अतिविकसित होने का तर्क चाहे जो भी दें, लेकिन वे ज्योतिष विज्ञान को नकार नहीं सकते हैं। सच तो यह भी है कि ज्योतिषीय दृष्टिकोण अपनाकर ही वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौहार्द्र, संस्कार और संवेदनशीलता की सुखद स्थितियों के संचार की उम्मीद की जा सकती है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करने वाले ग्रहों की दिशा और दशा के अनुसार विवाह योग बनते-बगड़ते हैं। जिन्हें समय रहते संतुलित किया जा सकता है, तो जन्म तिथि, समय व जन्म स्थान आधारित कुंडलियों का मिलान कर वैवाहिक जीवन की सफलता की कामना की जा सकती है।

कई बार देखा गया है कि सर्वगुण संपन्न लड़की को सुयोग्य जीवनसाथी नहीं मिल पाता है, या फिर उसके विवाह में विलंब होती है। इसी तरह से प्रतिभासंपन्न और सफल करिअर वाले युवक के विवाह में भी बाधा आती है। कुछ वैसे लोग भी होते हैं, जिनका वैवाहिक जीवन असफल हो जाता है, या फिर जल्द ही संबंध-विच्छेद तक की नौबत आ जाती है। यहां तक कि सफलता के शिखर पहुंचे व्यक्ति विवाह से वंचित रह जाते हैं। ऐसा अच्छी तरह से कंुडली मिलान नहीं किए जाने या विवाह योग नहीं बनने की वजह से ही होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार बनी कुंडली के अनुसार सकारातमक प्रभाव वाले ग्रहों की गतिशीलता पहचानकर नकारत्मक प्रभाव वाले ग्रह का दोष दूर करना आवश्यक होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बेहतर विवाह योग के लिए कुंडली के दूसरे, पांचवें, सातवें, आठवें और बारहवें घरों में बनी ग्रहों की स्थिति पर ध्यान दिय जाता है। इनमें मंगल, शनी, सूर्य, राहू और केतु ग्रहों की स्थिति का विशेष तौर पर परिणामी आकलन किया जाता है। इस आधार पर ही विवाह के उपयुक्त समय का निर्धारण भी संभव हो पाता है। पुरुष के लिए विवाह का कारक ग्रह जहां शुक्र है, वहीं स्त्री के लिए बृहस्पति होता है।

ये दूसरे ग्रहों के प्रभाव मंे आकर ही विवाह की अनुकूल या प्रतिकूल स्थितियां पैदा करते हैं। स्त्री की कुंडली का आठवां घर उसके भाग्य को दर्शाता है, तो स्त्री व पुरुष की कुंडली का बारहवां घर शैया-सुख अर्थात सुखद यौन-संबंध के बारे मंे बताता है। इसी अनुसार विपरीत लिंग के बीच लैंगिक आकर्षण बनता है और उनमें एक-दूसरे के प्रति अनुभूति प्रदान करने वाली भावनाएं जागृत होती हैं।

विवाह तय होने, वैवाहिक जीवन की मधुरता और पति-पत्नी की चारित्रिक विशेषताओं का आकलन करने, संतान-सुख मिलने तथा तलाक की नौबत आने तक की बातों का विश्लेषण काफी जटिलता लिए होता है। वैसे कोई भी व्यक्ति चाहे तो अपनी कुंडली के सातवें घर को देखकर अपने विवाह के साथ-साथ जीवनसाथी संबंधी संभावनाएं जान सकता है। इस स्थान का कारक ग्रह शुक्र है, लेकिन यहां शनि की स्थिति मजबूत बनने और बृहस्पति के कमजोर पड़ जाने के कारण कुशल विवाह योग प्रभावित हो जाता है। सूर्य के प्रभाव में आने से तलाक जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, तो मंगल के आने से मांगलिक  योग बन जाता है।

ज्यादातर लोग मंगल को ही विवाह के लिए बाधक मानते हैं। इसे मंगल योग कहा गया है। यह योग कुंडली के पहले, चैथे, सातवें और बारहवें घर में मंगल के होने से बनता है। यह विवाह में विलंब, विवाह के बाद दंापत्य में कलह, दंपति के स्वास्थ्य में गिरावट, दंपति के संबंध-विच्छेद यानि तलाक, या फिर जीवनसाथी की मृत्यु तक की आशंकाओं को भी जन्म देता है। मंगल योग के प्रभाव वाले व्यक्तियों का विवाह 27, 29, 31, 33, 35 या 37 वर्ष की उम्र में ही संभव हो पाता है।

इसके अतिरिक्त सातवें स्थान पर बुध की शक्ति भी कम हो जाती है। राहू और केतु के आने से जीवनसाथी से अलगाव की स्थितियां  पैदा हो जाती हैं। राहू के सातवें घर में होने की स्थिति में पति-पत्नी के बीच नहीं चाहते हुए भी दूरी बढ़ने लगती है। दोनें में से किसी एक के मन में विरक्ती के भाव या वैसी अप्रत्याशित परिस्थितियां पैदा होने से अलगाव सुनिश्चित हो जात है। यह कहें कि पत्नी अगर पति से दूर भागती है, तो पति मजबूरन पत्नी से दूरी बनाए रहता है। दोनों की कुंडली के सातवें घर में राहू या केतु के होने की स्थिति में विवाह के सालभर के भीतर ही तलाक की नौबत आ जाती है।

इसी तरह से केतु के होने की स्थिति में दंपति आजीवन अलग-अलग जीवन व्यतीत करने को विवश होते हैं। या फिर पति-पत्नी न तो एक-दूसरे को पसंद करते हैं, और न ही वे वैचारिक स्तर पर मधुरता कायम कर पाते हैं। हालांकि इसे ज्योतीषिया गणना के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों से ग्रहों की स्थिति को सही करवाया जा सकता है। अब सातवें घर का स्वामी कुंडली के सातवें घर में ही होने पर ऐसा व्यक्ति सफल वैवाहिक जीवन व्यतीत करता है। उन्नति की राह में कोई बाधा नहीं आती है और पति-पत्नी के आपसी संबंध मधुर बने रहते हैं।

ज्योतिष की भाषा में विवाह की स्थिति सप्तमेश यानि लग्नेश की महाअंतर्दशा या सिर्फ अंतर्दशा के बनने पर आती है। यानि कि सातवें घर की ग्रहीय स्थिति के साथ बृहस्पति अर्थात गुरु की महादशा और शुक्र की अंतर्दशा से विवाह योग की संभावना प्रबल हो जाती है। यह कहें कि सातवें या उससे संबंध रखने वाले ग्रह की महादशा या अंतर्दशा में विवाह योग बन पाता है। जिस किसी की कुंडली में बृहस्पति सातवें घर में होता है, उसके शीघ्र विवाह होने की संभावन बनती है। संभव है उनका विवाह 21-22 वर्ष की उम्र में ही हो जाए।

इसी तरह से कुंडली के सातवें घर में शुक्र के होने की स्थिति में व्यक्ति का विवाह युवावस्था में ही संभव है। दूसरी तरफ बेमेल विवाह के योग कुंडली में चंद्रमा के उच्च स्थिति में होने के कारण बन सकते हैं। विवाह में देरी का मुख्य कारण मंगल के छठे घर में होना है।

विवाह योग के लिए कुंडली का मिलना करने वाले ज्योतिष द्वारा स्त्री की कुंडली में बृहस्पति और पुरुष की कुंडली में सूर्य को देखा जाता है। इसी के साथ सुखद वैवाहिक जीवन का विश्लेषण करने के सिलसिले में कुंडली के चैथे घर का अध्ययन किया जाता है। अर्थात विवाह का संपूर्ण निर्णय कुंडली के सातवें घर के अतिरिक्त चैथे, पांचवें और ग्यारहवें घर में स्थित ग्रहों की स्थितियों के आधार पर लिया जाता है।